क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ इंडिया ने आयोजित किया कर्टेन रेज़र, तीसरे संस्करण के लिए मंच तैयार किया

नई दिल्ली, ।: दून कल्चरल एंड लिटरेरी सोसाइटी ने आज क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ इंडिया (सीएलएफआई) के तीसरे संस्करण की घोषणा के लिए कर्टेन रेज़र कार्यक्रम का आयोजन किया। यह अपराध, साहित्य, मीडिया एवं कानून प्रवर्तन के बीच के अंतर को दूर करने की दिशा में शक्तिशाली पहल है। आज नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ऑडिटोरियम में जानी-मानी हस्तियों के बीच रोचक वार्ता हुई, जिन्होंने 12 से 14 दिसम्बर 2025 के बीच ह्यात सेंट्रिक, देहरादून में आयोजित होने वाले मुख्य कार्यक्रम पर रोशनी डाली।
इस कार्यक्रम ने आगामी महोत्सव के लिए मंच तैयार किया। यहां आयोजित दो सत्रों में पुलिस, मीडिया, कानूनी सुधार एवं सामाजिक न्याय सहित विभिन्न क्षेत्रों से देश के जाने-माने दिग्गज इकट्ठा हुए।
पहला सत्रः मैडम सर- समाज की रूढ़ीवादी अवधारणाओं को तोड़ना
पहले सत्र ने वर्दी में आगे बढ़ने वाले पुरूषों एवं महिलाओं पर विचार रखे, जिन्होंने पुलिस एवं प्रशासन की पारम्परिक बाधाओं को तोड़ा है। इस सत्र का संचालन आलोक लाल, पूर्व डीजीपी, लेखक एवं पूर्व पुलिस चीफ़ ने किया। उन्होंने इस विषय पर निजी एवं गहन विचार रखे।
मिस मंजरी जरूहर, बिहार की पहली महिला आईपीएस अधिकारी ने अपनी यात्रा के शानदार किस्से सुनाए, तथा सुरक्षा बलों में लिंग भेदभाव के प्रति संवेदनशीलता पर विचार रखे; श्री मनोज कुमाल लाल, पुडुचैरी के पूर्व डीजी ने अपराध एवं कानून प्रवर्तन में अपने अनुभवों तथा साहित्यिक अन्वेषणों पर विचार रखे। उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों जैसे सोनम रघुवंशी मामला एवं अतुल सुभाष मामले पर अपने विचार साझा किए; श्री ए.पी. माहेश्वरी, सीआरपीएफ के पूर्व डीजी और विशेष सचिव (गृह), एमएचए ने अपराध प्रबन्धन एवं भीतरी सुधार में लीडरशिप और सुधारों पर चर्चा की; डॉ राजेश मोहन, डीसीपी, (टै्रफिक), गुरूग्राम ने शहरी नीतिगत चुनौतियों पर बुनियादी स्तर का परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया।
दूसरा सत्रः एक समान न्यायः क्या पुरूष पीछे छूट रहे हैं?
दूसरे सत्र ने भारत में लिंग अपराध कानूनों की विवादित एवं बदलती स्थितियों पर चर्चा हुई, और इसका संचालन अशोक कुमार, उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी, खाकी फेस्टिवल के चेयरमैन और डीसीएलएस के प्रेज़िडेंट ने किया, जिनकी मौजूदगी ने चर्चा को को विशेष दृष्टिकोण प्रदान किया।
वरिष्ठ पत्रकार और भारत में समाचार जगत की सबसे भरोसेमंद़ आवाज़ों में से एक, निधि कुलपति ने पत्रकारिता के नज़रिए से स्पष्ट विचार रखे; वृतचित्र फिल्मनिर्माता और पुरुषों के अधिकारों की पक्षधर दीपिका नारायण भारद्वाज ने लिंग संबंधी न्याय में नज़रअंदाज़ की गई बातों पर ज़रूरी सवाल उठाए। दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर, देवेश श्रीवास्तव ने अपने दशकों के अनुभव के आधार पर कानून लागू करने में संतुलन और सहानुभूति की आवश्यकता पर ज़ोर दिया; और सुप्रीम कोर्ट की वकील जूही अरोड़ा ने कई महत्वपूर्ण विषयों पर ज़रूरी जानकारी दी जैसे कानूनों का तात्पर्य कैसे निकाला जा सकता है, उनका गलत इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है और उनमें सुधार कैसे किया जा सकता है।

अशोक कुमार, उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी, फेस्टिवल चेयरमैन और दून कल्चरल एंड लिटरेरी सोसाइटी ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट ने कहा, “देश में लगातार बढ़ते अपराध दर को देखते हुए, हमारे समाज को जागरूक बनाने और इतिहास से सीखने के लिए अलग-अलग तरह के साहित्य को बढ़ावा देने की ज़रूरत है। इसके अलावा, किसी भी मामले को समझदारी से सुलझाने में अधिकारियों के योगदान को बहुत सराहा जाना चाहिए। क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ इंडिया के साथ, हम ऐसे प्लेटफॉर्म का प्रस्ताव देते हैं, जो पुलिस बिरादरी के साथ-साथ जाने-माने कंटेंट क्रिएटर्स को भी एक मंच पर लेकर आएगा। इस मंच के प्रतिभागी साहित्य के ज़रिए न सिर्फ लोगों को जागरुक बनाएंगे बल्कि एंटरटेनमेंट सेक्टर में भी अपराध शैली को लेकर उत्सुकता भी बढ़ाएंगे। हमें विश्वास है कि आगामी तीसरे संस्करण में हिस्सा लेने वाले लेखक और फिल्म प्रोड्यूसर नए विचारों, उपलब्धियों, सबकों तथा रोमांचक किस्सों को साझा करेंगे।

आलोक लाल, पूर्व डीजीपी, जाने-माने लेखक और फेस्टिवल डायरेक्टर, ने कहा, अपराध को समझना सिर्फ मामले सुलझाने से कहीं बढ़कर है; इसके लिए लोगों, सिस्टम और समाज की समझ ज़रूरी है। क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया के ज़रिए, हम वास्तविक कहानियों को सामने लाना चाहते हैं, ताकि लोग न सिर्फ यह समझ सकें कि क्या हुआ, बल्कि यह क्यों हुआ और हमें इससे क्या सीखना चाहिए। यह फेस्टिवल वास्तविक अनुभवों एवं सामाजिक जागरुकता के बीच; दस्तावेजों एवं बदलाव के बीच, और कानून लागू करने वालों और इसकी कहानियाँ सुनाने वालों के बीच एक पुल की तरह काम करेगा।’’
दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर देवेश श्रीवास्तव ने कहा, “कानून लागू करने वाली एजेंसी को समाज के साथ बदलना होगा, उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि सहानुभूति और निष्पक्षता भी अनुशासन एवं कानून लागू करने की तरह ही ज़रूरी बनी रहे। हमारे सामने आने वाला हर मामला हमें याद दिलाता है कि अपराध अकेले नहीं होता; यह इंसान से जुड़ी वास्तविक कहानियों, संघर्षों और हालात से पैदा होता है। क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया जैसे प्लेटफ़ॉर्म ऐसी बातचीत को बढ़ावा देते हैं जो एक समान समाज के निर्माण के लिए ज़रूरी है, जहाँ हर आवाज़ सुनी जाती है और हर सच की जांच बिना किसी भेदभाव के की जाती है।”
“हमारे देश में ज़्यादातर कानून महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों से निपटने और महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए बनाए गए हैं। हालांकि, ऐसे मामले भी बढ़ रहे हैं जहां कुछ नियमों का गलत इस्तेमाल होता है, और पुरुष भी इसके शिकार बनते हैं। ऐसे कई मामले हैं जहां पुरुष दोषी नहीं होते, फिर भी मौजूदा कानूनों के गलत इस्तेमाल या असंतुलन के कारण उन्हें गंभीर नतीजे भुगतने पड़ते हैं, जिससे न्याय के बजाय दबदबे की भावना पैदा होती है। अब इस कमी को दूर करने और ऐसे सुधारों की दिशा में काम करने की आवश्यकता है जो पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए निष्पक्षता, जवाबदेही और सही मायने में एक समान न्याय को सुनिश्चित करें,” दीपिका नारायण भारद्वाज, फिल्मनिर्माता और पुरुषों के अधिकारों की पक्षधर ने कहा।
मंजरी जरूहर, लेखिका और बिहार की पहली महिला आईपीएस अधिकारी ने कहा, “जब मैंने पहली बार अकेली महिला ऑफिसर के तौर पर यूनिफॉर्म पहनी, तो माहौल अपने आप में चुनौतीपूर्ण था। कुछ अजीब पल थे, लोग अजीब तरह से घूर रहे थे, और उन लोगों में हैरानी थी जिन्होंने कभी किसी महिला को इस तरह से चार्ज लेते नहीं देखा था। लेकिन समय के साथ, वो नज़रें सम्मान में बदल गईं, और मुझे प्यार से ‘हंटरवाली’ कहा जाने लगा; और ऐसा लोग ज़बरदस्ती या गुस्से की वजह से नहीं, बल्कि निष्पक्ष और पक्के यकीन के साथ नेतृत्व करने की हिम्मत के लिए कहने लगे थे।
मेरा मानना है कि व्यक्तिगत एवं पेशेवर, दोनों क्षेत्रों में सशक्त महिलाएं, अपनी हर भूमिका को ज़िम्मेदारी और नैतिकता के साथ निभाती हैं। यह यात्रा न सिर्फ मेरे लिए, बल्कि पुलिस में कार्यरत सभी महिलाओं एक बड़ी कामयाबी रही है। आज, लोगों को स्वीकार किया जा रहा है, कमांड पॉज़िशन पर बराबरी आम बात हो गई है, और क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल जैसे प्लेटफ़ॉर्म इन ज़रूरी बदलावों के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद कर रहे हैं।”
इस कार्यक्रम में प्रायोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। एम3एम फाउंडेशन की ट्रस्टी डॉ. ऐश्वर्या महाजन को सुधार और संवाद को प्रेरित करने वाले प्लेटफॉर्म को सक्षम बनाने में फाउंडेशन की समर्पित भूमिका के लिए सम्मानित किया गया।

पिछले तीन सालों से, क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया ने न सिर्फ़ साहित्य के क्षेत्र में, बल्कि आज के भारत की नैतिक और कानूनी कहानी को आकार देने में भी कई बेंचमार्क स्थापित किए हैं। यह कर्टेन रेज़र साफ़ तौर पर उस मुख्य आयोजन की झलक प्रस्तुत करता है जिसका सभी को बेसब्री से इंतज़ार है।ऐसी कहानियों का जश्न मनाता है जो सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं करतीं, बल्कि समाज पर सवाल उठाती हैं, उसे चुनौती देती हैं और बड़े बदलाव लाती हैं।

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